आरोपों के नाम पर सालों की जेल, दोषी को बार-बार राहत — क्या इस सरकार के राज में कानून दोहरा हो गया है?

0

National: देश में कानून और न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शरजील इमाम, उमर खालिद और उनके जैसे कई लोग पिछले पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं। इन पर अभी सिर्फ आरोप हैं, लेकिन न तो नियमित ट्रायल शुरू हुआ और न ही जमानत मिल सकी।

यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत सरकार और जांच एजेंसियों को लगभग असीमित शक्ति मिल जाती है, जहां “आरोप” ही जेल में रखने के लिए काफी माना जा रहा है। सवाल यह है कि अगर दोष सिद्ध नहीं हुआ है, तो वर्षों तक कैद में रखना किस न्याय का उदाहरण है?


इस पूरे मामले में सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या जांच एजेंसियों पर समय पर चार्जशीट और ट्रायल पूरा करने का कोई दबाव नहीं है? या फिर असहमति और सरकार-विरोधी विचार रखने वालों को सजा ट्रायल से पहले ही दी जा रही है?


इसके उलट, बाबा राम रहीम जैसे दोषी, जिन्हें अदालत ने गंभीर अपराधों में सजा सुनाई है, उन्हें बार-बार पैरोल और जमानत मिलती रही है। सरकार इसे “कानूनी प्रक्रिया” बताकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन आम जनता के मन में सवाल साफ है—क्या कानून सबके लिए बराबर है?


न्याय में देरी, ट्रायल का न होना और चुनिंदा लोगों को राहत मिलना, यह संकेत देता है कि समस्या कानून की नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल की है। अब सवाल सिर्फ जमानत का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की आत्मा को लेकर है।

 

Writer: 𝑀𝑑 𝑃𝑎𝑟𝑣𝑒𝑧

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed