अरावली पर्वत श्रृंखला: पर्यावरण संतुलन की रीढ़, लेकिन बढ़ता संकट

0

अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक मानी जाती है, जो देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में लगभग 700 किलोमीटर तक फैली हुई है। यह पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी इसकी अहम भूमिका है।


अरावली पर्वत मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल स्तर को संतुलित रखने और जैव विविधता को संरक्षण देने का कार्य करता है। यह थार मरुस्थल को उत्तर और पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने में एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करता है। यहां कई दुर्लभ वनस्पतियां और वन्य जीव पाए जाते हैं, जो इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को समृद्ध बनाते हैं।


हालांकि, बीते कुछ वर्षों में अरावली पर्वत श्रृंखला पर गंभीर संकट गहराता जा रहा है। अवैध खनन, जंगलों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियों के कारण पहाड़ों का तेजी से क्षरण हो रहा है। खासकर हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में पत्थर खनन और निर्माण कार्यों ने अरावली की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचाया है।


पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सीधा असर जल संकट, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन पर पड़ेगा। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में बढ़ता वायु प्रदूषण भी कहीं न कहीं अरावली के कमजोर होते पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा माना जा रहा है।


सरकार और प्रशासन की ओर से अरावली संरक्षण के लिए कई योजनाएं और नियम बनाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनके प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है। विशेषज्ञों ने अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से संरक्षण अभियान चलाने की मांग की है।


अरावली पर्वत केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक विरासत है। इसके संरक्षण के लिए सरकार, समाज और नागरिकों को मिलकर ठोस प्रयास करने होंगे, ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे और भविष्य सुरक्षित हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed