पालघर में आदिवासी किसानों का ऐतिहासिक पैदल मार्च, लेकिन नेशनल मीडिया खामोश
पालघर, महाराष्ट्र।
महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में जंगल, ज़मीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए 50 हज़ार से अधिक आदिवासी किसान सड़कों पर उतर आए हैं। हाथों में झंडे, आँखों में सवाल और पैरों में छाले—आदिवासी समुदाय का यह विशाल पैदल मार्च अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी जन-आंदोलन की तस्वीरें और आवाज़ें नेशनल मीडिया से लगभग गायब हैं।
आयोजकों के अनुसार, यह मार्च वनाधिकार कानून (Forest Rights Act), ज़मीन के पट्टे, बेदखली रोकने और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को लागू कराने की माँग को लेकर किया जा रहा है। किसानों का कहना है कि दशकों से वे अपनी ही ज़मीन पर “अवैध” बताए जाते रहे हैं, जबकि कानून उन्हें अधिकार देता है।
मार्च में शामिल बुज़ुर्ग, महिलाएँ और युवा—सभी एक ही सवाल पूछ रहे हैं:
क्या आदिवासी मुद्दे TRP नहीं लाते?
क्या जंगल, ज़मीन और संविधान की लड़ाई “ब्रेकिंग न्यूज़” के लायक नहीं है?
जहाँ एक ओर राजनीतिक बयानबाज़ी और स्टूडियो डिबेट्स को घंटों का प्राइम टाइम मिलता है, वहीं दूसरी ओर हज़ारों किलोमीटर पैदल चल रहे आदिवासी किसानों की पीड़ा और संघर्ष मुख्यधारा की सुर्खियों से बाहर है। यह खामोशी सिर्फ मीडिया की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी है जो विकास की बात तो करती है, लेकिन सबसे पहले हाशिए पर खड़े लोगों को भूल जाती है।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि अगर यही मार्च किसी महानगर में होता या किसी प्रभावशाली वर्ग से जुड़ा होता, तो कैमरे सबसे आगे होते। सवाल यह नहीं है कि मीडिया क्या दिखा रहा है, सवाल यह है कि मीडिया क्या नहीं दिखा रहा।
पालघर की सड़कों पर चल रहा यह मार्च सिर्फ एक ज़िले की घटना नहीं है। यह देश के उस हिस्से की आवाज़ है जिसे अक्सर “विकास” की कहानी से बाहर रखा जाता है।
अब देखना यह है कि क्या यह आवाज़ दिल्ली के न्यूज़ रूम तक पहुँचेगी—या फिर आदिवासियों की यह लड़ाई एक बार फिर इतिहास के हाशिए पर छोड़ दी जाएगी।
